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अडॉप्ट अ हेरिटेज का सच

‌ ‌अंग्रेजी की एक कहावत 'पेन्नी वाइज पौंड फुलिश' जिसका हिंदी में अर्थ होता है मोहर लुटी जाए, कोयले पर छाप पड़े। अर्थात अधिक मूल्यवान वस्तु की परवाह न करना और अपेक्षाकृत कम मूल्य की वस्तु के विषय में चिंतित होना। कमोबेश ऐसी ही कुछ उहापोह की स्थिति सरकार द्वारा शुरू की गईं "अडॉप्ट अ हेरिटेज" स्कीम के कारण उपजी है। जिसके तहत दिल्ली के ऐतिहासिक धरोहर लाल किला को 5वर्षो के लिए देखरेख और मरम्मत कार्यो के लिए डालमिया समूह को 25 करोड़ के अनुबंध पर दिया गया है। गौरतलब बात ये है कि कुछ भ्रामक पोस्ट के जरिये अलग अलग प्रतिक्रिया देकर इस विषय को कभी राष्ट्रवाद और कभी हिंदुत्व से जोड़ कर पेश किया जा रहा है। वास्तव में देखा जाए तो इसे सरकारी प्रशासनिक तंत्र की विफलता से जोड़कर देखा जा सकता है, जहां एक तरफ तो सरकार को राष्ट्रीय स्मारकों पर होने वाला व्यय वहनीय नही लग रहा है तो दूसरी तरफ संभवतः विगत सरकारों की तरह ही भाजपा को अपनी जुमलेबाजी 'न खाऊंगा और न खाने दूंगा' गले की फांस बनती सी लग रही है। अब भले ही मोदी सरकार के दामन पर अभी तलक कोई भी भ्रस्टाचार का सीधा सीधा आरोप न

उफ्फ ये कमज़र्फ मोहब्बत

सुनील और राधा एक साथ एक ही कॉलेज में पढ़ते है। दोनो ही एक मध्यम परिवार से ताल्लुक रखते है। सुनील के बाप का सपना है कि बेटा पढ़-लिख कर कुछ बन जाये तो घर का भी सहारा हो जाएगा और बेटे की जिंदगी भी संवर जाएगी। वहीं राधा के बाप को लगता है कि बेटी का शिक्षित होना जरूरी तो है साथ ही साथ बेटी की शादी के लिए एक अनिवार्य अहर्ता भी है। बाकी सभी बिंदुओं को अगर दरकिनार कर दे तो कहीं न कहीं राधा को भी ये बात पता है कि पढ़ाई पूरी होने के साथ ही साथ उसके घर वाले उसका कहीं न कहीं रिश्ता कर देंगे। राधा वक्त के साथ चलने वालों में से है, वो कहते है न कि लड़की गाय होती है गाय, एक खूंटे से खोल कर दूसरे में बांध दो। नतीजतन राधा की अपनी जिंदगी से कुछ खास अपेक्षाएं नही है। दूसरी तरफ सुनील को लगता है कि भले ही वो एक मध्यम परिवार में पैदा हुआ है मगर वह इसे अपनी नियति नही बनाना चाहता है। उसे अपने ज्ञान और मेहनत पर पूरा भरोसा है और उसे लगता है कि मेहनत और लगन के बल पर सब कुछ पाया जा सकता है। इसी बीच कुछ ऐसा होता है जिसकी किसी ने भी कल्पना नही की होती है। वो कहावत है न, अपोजिट अट्रैक्ट्स। हां बस वही बिल्कुल फिट बैठ

How to deal with stubborn boss

One of my friend is working in a good company. He has joined this organization recently. The very first day he came after the interview, he was very pexed. He shared his experience of interview. His boss grilled him so much that he was dead sure that he will not through with it. However it came with the surprise that he has been selected after a week. Many of his friend suggested him that usually employers do so to check the stability and confidence of prospective employee. They named it pressure interview. The confidence of my friend was almost shackled. However, he joined the organization sidelining his intuition of being screwed every time. A few days passed when things started turning out other way. Every time he reaches office, he used to be afraid of loosing his job or to be rebuked for every other thing. His boss started reminding him that he is getting much more than what he deserves. Nagging in all his acts became a regular fashion for his boss. His senior also tried to

हंगामा है क्यों बरपा.....

पदमावत रिलीज हो गयी, करनी सेना की धमकी मात्र एक गप्प साबित हुई और लोगों ने इसका मजाक बनाना भी शुरू कर दिया। इन सब विवादों के बीच बुद्धिजीवी वर्ग दो खेमो में बंट गया और पिक्चर को लेकर अपनी अपनी राय देने में जुट गया। परंतु ध्यान से देखा जाए तो दोनों पक्षों की दलीलों में ज्ञान का पुट कम और तर्क का पुट ज्यादा लगता है। जिस प्रकार फौजदारी के मामले देखने वाले वकील के लिए ज्ञान से ज्यादा जरूरी तर्क होते है कमोबेश ठीक ऐसा ही कुछ इस पर बहस करने वाले पक्षो पर भी लागू होता है। व्यक्तिगत रूप से देखा जाए तो इस फ़िल्म को लेकर उठ रहे विवाद निर्मूल ही है, और इसके पीछे मेरे अपने तर्क है। सर्वप्रथम तो भंसाली को करनी सेना का शुक्रगुजार होना चाहिए था। क्योंकि करनी सेना की वजह से ही सही लंबे अंतराल के बाद कोई ऐतिहासिक फ़िल्म (हिस्टोरिकल मूवी) इतनी बड़ी हिट हो सकी अन्यथा अभी तक जितनी भी ऐतिहासिक पिक्चरें बनी है उसमे से चंद पिक्चरें जैसे मुगले आजम अथवा बाजीराव मस्तानी वगैरह को छोड़ दिया जाए तो शायद ही कोई फ़िल्म इतनी जबरदस्त हिट रही हो। उस पर से भंसाली जैसे डायरेक्टर ने तो अकेले मूवी का बीमा ही

बात बात का फर्क

किसी बात को कहने के अंदाज से ही बात की प्रांसगिकता निर्धारित होती है। और बात की प्रासंगिकता से बात कहने वाले और कही गयी बात का आशय निर्धारित किया जाता है। मसलन पूर्व में समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता और अपने जमाने के लोकप्रिय अभिनेता रह चुके श्री. राज बब्बर जी ने गरीबी को लेकर एक विचित्र बयान दे डाला। उनका कहना था कि आज गरीब एक दिन का भोजन 32 रुपये में कर सकता है। ये बात विपक्षी नेताओं को बुरी लगी और वे न सिर्फ इसका मजाक उड़ाने लगे बल्कि गरीबी निर्धारित करने के इस मापदंड पर ही सवाल उठाने लगे। गौरतलब है कि गरीबी निर्धारित करने को गठित की गई कई समितियों में बड़े ही विचित्र तरीके अपनाए थे, जिनमे से एक था कैलोरी आधार- जिसमे शहरों और गांवों में कार्यरत लोगो की कार्य क्षमता के आधार पर कैलोरी का निर्धारण किया जाता और अमीर व गरीब में विभेद किया जाता था। मसलन ग्रामीण क्षेत्र के लिए 2435 कैलोरी तथा शहरी क्षेत्रों के लिए 2025 कैलोरी से कम उपभोग करने वाले को गरीब माना गया। परंतु जयपुर और ऐसे ही अन्य क्षेत्रों जहां बाजरे की पैदावार और खपत दोनो ज्यादा है वहाँ ये कैलोरी लक्ष्य महज 2

आखिर गाँधी महान क्यों है?

मित्रो मेरे इस लेख का प्रयोजन कुछ पथ भ्रमित लोगों, जो गाहे-बगाहे गाँधी जी की प्रासंगिकता और उनके होने या न होने के औचित्य पर मूर्खतापूर्ण टीका टिपण्णी करने वालो को मेरा प्रत्युत्तर कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी । जहाँ एक तरफ भारत की स्वतंत्रता से लेकर औद्योगिक विकास के क्रम में गाँधी जी की दूरदर्शिता साफ़ परिलक्षित होती है वहीँ दूसरी तरफ एक महान क्रांतिकारी और देश को दिशा प्रदान करने वाले महापुरुष के चरित्र और कार्यकलापो पर प्रश्नचिन्ह लगाने वालो का गर्दभरुदन निसंदेह मेरे समझ से परे है । मेरे इस लेख का उद्देश्य न केवल लोगों को गाँधी जी के उन कार्य कलापों से अवगत कराना है जिसने उन्हें महान बनाया बल्कि उन्हें उस परिपेक्ष से भी रूबरू कराना है जिसने गाँधी जी के आन्दोलन को एक दिशा दी । बात उन दिनों की है जब भारत में अंग्रेजी शासन अपने चरम पर था । भारतीय अग्रेजो द्वारा न केवल प्रताणित किये जा रहे थे बल्कि अंग्रेजो ने भारतीय उद्योग धंधो को भी बहुत अधिक क्षति पहुंचाई थी । गाँधी जी के स्वतंत्रता के लिए जारी संघर्ष और उनके सहयोग के लिए कुछ लोग गांधी जी से आकर मिले और उन्हें

The Forbidden Protagonists

Once I was asked about my favorite mythological ideals. Without much consideration and second thought I named, Karna from Mahabharta and Bharat from Ramayana. Karna was obvious to many to guess because of his virtues but very few were fully aware of the character of Bharat. Practically I don’t blame them. We are born and raised in a country where people of second fiddle are less important than main lead. The protagonists are often shown larger than life and other characters are often given less importance. The veteran and very talented writer of that time Ved Vyas did justice with every character and gave due weight-age to everyone. However, the irony of such an epic that hindu families consider it a bone of contention if kept at home. But prefer to keep another equally talented writers mythological and holy book of Ramayna. Indian families do not stop here only but every now and then preach and expect their children to follow the path of Dharma and become second Rama. What