प्राप्त और अप्राप्त


प्रेमिकाएं पत्नियां बनना चाहती है और प्रेमी पति। शायद ही कोई ऐसा हो जो अपनी वर्तमान स्थिति से खुश हो। वास्तव में प्रत्येक व्यक्ति अपने अधिकार को और प्रभावी और तर्कसंगत बनाने में लगा हुआ है। और जब व्यक्ति इस अधिकार को प्राप्त भी कर लेता है तो पुनः अपने पुराने दिनों की स्वतंत्रता और उन्मुक्तता को याद करके दुःखी होता है। प्रेमिका जब पत्नी और प्रेमी जब पति बन जाता है तो प्रेम ही समाप्त हो जाता है। जो प्राप्त है वही पर्याप्त है ऐसा तो केवल समझौते में होता है प्रेम में नही। प्रेमी-प्रेमिका अपने प्रेम को लेकर संशकित रहते है शायद इसीलिए उनके मध्य प्रेम जीवित रहता है। परंतु विवाह के उपरांत प्रेम का स्थान जिम्मेदारियां ले लेती है और प्रेमी युगल प्रायः यही शिकायत करते है कि तुम तो बदल गए हो। शादी के पहले तो तुम ऐसे थे, वैसे थे फलाना-ढिमका। कारण सिर्फ आगे या भविष्य की चिंता है जो वर्तमान के सुखों को होम कर देती है। तुम अधिकार चाहते थे , तुम्हें मिल गया। स्थायित्व चाहते थे, मिल गया और जो नहीं चाहते थे वो तो खुद--खुद तुमसे दूर हो गया फिर किस बात की चिंता कर रहे हो। तुम्हें चिंता इस बात की है जो पहले हासिल नही था वह तो मिल गया लेकिन जो हासिल था वो तुमने खो दिया। इसके दोषी तुम स्वयं हो क्योंकि तुमने कभी उस प्रेम की चिंता ही नही की। तुम्हें तो चिंता केवल अधिकार की थी। रात-दिन, प्रेम अलाप या विरह में तुम शायद ही इस विचार से मुक्त हो पाए हो। तुम्हें डर था कि जो तुम्हारे पास है कहीं तुम उसे खो दो और इसका सिर्फ एक ही रास्ता तुम्हें समझ आया, दूसरे पर अधिकार प्राप्त करना, उसके विचारों, उन्मुक्तता और सौंदर्य पर कब्जा करना। प्रकृति बहुत निर्दयी है यह व्यक्ति को सभी विकल्प नही देती। एक हासिल करने जाओगे तो दूसरा छूटेगा ही छूटेगा। निर्णय तुम्हें स्वयं करना है कि वास्तव में तुम क्या प्राप्त करने निकले हो? और अगर वह तुम्हें हासिल भी हो जाये तो क्या तुम्हें पूर्ण आनंद मिलेगा या फिर भी मन में एक टीस रह जायेगी।

लेखक-देवशील गौरव


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