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शिक्षा व्यवस्था की कार्यप्रणाली: केवल फीस वृद्धि ही समस्या नहीं है!

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  तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है। हिंदी साहित्य के महान कवि अदम गोंडवी जी की लिखी नज़्म की ये लाइनें आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितना तब थी। और ये बात वर्तमान शिक्षा पद्धति पर एक दम सटीक बैठती है। संविधान के अनुच्छेद 21A से प्रेरणा लेकर शिक्षा के अधिकार (राइट टू एजुकेशन) का प्रावधान किया गया। जिसे Right of Children to Free and Compulsory Education Act, 2009 के नाम से भी जाना जाता है। इसके तहत १४ वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया गया। चूँकि यह अधिकार गरीब एवं ऐसे लोगों को ध्यान में रख कर बनाया गया जो आर्थिक तंगी की वजह से अपने बच्चों को समुचित शिक्षा नहीं दिला पाते। परन्तु सरकारी स्कूलों के पढ़ाई के तौर-तरीके हमेशा विवादों के घेरे में रहे है। ऐसे में आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत सुदृण मध्यमवर्गीय परिवारों ने निजी संस्थानों को यह सोच कर वरीयता दी कि इससे न केवल उनके बच्चों को बेहतर शिक्षा मिलेगी बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता में भी सुधार होगा। परन्तु यहीं उनसे एक बड़ी चूक हो गयी। शिक्षा के लिए बनाए गए निजी विद्यालय ...

The World After the WTO: What's Next for Global Trade?

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  The world seems to be standing at a crucial juncture where political ambitions are challenging the predetermined threshold of trade and economics. Old friends turning into foes and vice versa. The majority of experts failed to understand the real reason for the predicament of Western economies and the relevance of aged, preserved ties of centuries. However, the old saying goes that when two bulls fight, the crop suffers. In economics, the loss of one’s is a gain to someone else. Now forget about the conflict between the US & Russia; the new challenge of existence looms over the WTO. Being the prominent arbitrator of global trade for centuries, it seems to be losing its relevance and existence. Let’s understand why and what will happen after the WTO. Amid rising tension over the tariff row, US trade envoy Brendan Lynch visited Delhi for bilateral talks on the trade agreement. This discussion seems meaningless due to the adamant behaviour of the Trump government over the forced...

खिलाफत से 'पोस्टर विवाद' तक: क्या भारतीय मुसलमान अंतरराष्ट्रीय शतरंज के मोहरे हैं?

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इतिहास गवाह है कि जवान होता बेटा अपने बाप को निरा बेवक़ूफ़ समझने की गलती जरूर करता है। ठीक ऐसा ही गाय-भैस के बछड़े के साथ होता है जब उसके सींग आने लगते है। उसे लगता है कि अब वो भी साँढ़ या बैल बन जाने के करीब है और फिर उसका रुआब और बढ़ जाएगा। मगर होता इसके ठीक विपरीत है और अंततोगत्वा उसे पता चल ही जाता है कि जैसा वो सोचता था दुनिया उसके बिलकुल विपरीत ही चल रही है। और भले ही वह कितना भी उछाल कूद क्यों न कर ले उसके ऐसे सभी काम मूर्खता की परिभाषा ही तय करेंगे। पिछले कुछ दिनों से राजनितिक और धार्मिक आधार पर किये गए विभिन्न सोशल मीडिया पोस्ट और कमेंट का अगर सही तरीके से विश्लेषण किया जाए तो एक महत्त्वपूर्ण तथ्य जो सामने निकलकर आता है वो सामाजिक सौहार्द्य को बिगाड़ने वाला और धर्म को देश से ऊपर रखने की प्रवित्ति को दर्शाता है। गत दिनों में देश विशेष को लेकर किये गए पोस्टर विवाद और नारेबाजी की घटनाओं के बाद यह पैटर्न बिलकुल साफ़ हो जाता है कि ऐसे लोगों की एक बड़ी खेप तैयार होती जा रही है जो व्यक्तिगत बयानबाजी से देश की छवि को अंतर्राष्ट्रीय ही नहीं भीतर से भी नुकसान पहुंचा रही है। यहाँ एक महत्त्वपूर्ण...

राजा का प्रश्न और किसान का आईना

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एक बार एक राजा के मन में कौतुहल उठा कि दुनिया में ऐसी कौन सी वस्तु है जिसकी पराकाष्ठा या सीमा नहीं है। राजा ने अपने दरबार में यह प्रश्न दरबारियों के सम्मुख रखा और साथ में यह भी हिदायत दी कि तर्क देने वाले व्यक्ति को उसके तर्क को साबित करने के लिए प्रमाण भी देना होगा। और यह प्रमाण ऐसा होना चाहिए जिससे राजा के साथ-साथ अन्य सभी व्यक्ति भी उस प्रमाण और तर्क के सहमत हो सके। जो व्यक्ति इस प्रश्न का सही-सही जवाब प्रस्तुत कर पायेगा उससे बहुत ढेर सारा पुरस्कार दिया जायेगा और जो असफल होता है उसे मृत्युदंड दिया जाएगा। प्रश्न तो सभी व्यक्तियों को आसान लगा और उन्हें लगा कि वे उसका बेहतर जानते है परन्तु मृत्युदंड के भय के कारण कोई भी व्यक्ति उत्तर देने कि हिम्मत नहीं जूता पाया। राजा अत्यंत चिंता में पड़ गया और इसके लिए उसने १ हफ्ते का समय भी दिया। राजदरबार से बाहर निकलकर सभी अपनी-अपनी राय देने लगे मसलन कोई बुद्धि, कोई धन, ज्ञान, ईश्वर और कोई वीरता आदि को श्रेष्ठ बताने में लगा था। ऐसे विमर्श का कोई भी निश्चित हल निकल पाना प्रायः असंभव होता है। और प्रमाण तो और भी मुश्किल है। उड़ते-उड़ते यह बात उस नगर के ...

गुनाह-ए-बेवकूफी

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  कभी अपनों कभी रब से किनारा कर लिया मैंने, तसल्ली दिल को झूठी दे के गुजारा कर लिया मैंने।  सुना है अब मेरे साये से बचकर लोग चलते हैं, मगर ये ज़हर भी हंसकर गंवारा कर लिया मैंने। इसे खुदगर्जी कह लो,जरूरत या तलब मेरी, तेरी हर बात, हर जज्बात से खुद को पराया कर लिया मैंने।  तेरे हर रंग और फितरत से मैं तो खुद ही गाफिल था, खुद ही नजरों से गिर के खुद को बेचारा कर लिया मैंने। सुना है वक्त आता है सभी का जिंदगी में इक बार, इसी एक बेवकूफी को सहारा कर लिया मैंने। अदावत और दौलत के तराज़ू तुम तो न लाते , तेरी उन्मीद रख के ये गुनाह दोबारा कर लिया मैंने।
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  अक्स-ए-सफर (सफर की परछाई) दिया सूरज को दिखलाने में लगे है,  चंद कुछ लोग मुझको आजमाने में लगे है।  कभी करते थे जो बातें हमेशा साथ देने की,  वही कुछ लोग अब आँखें दिखाने में लगे है।  भुला बैठे है शायद की किसकी कोशिशों से पायी है मंजिल,  मेरे कुछ दोस्त मुझको समझाने में लगे है।  मेरी मंजिल अभी है दूर और फासला लम्बा,  कहाँ समझेंगे वो लोग जो बातें बनाने में लगे है।  कभी उन्मीद रखी जो तो बेमानी हुई साबित,  है कुछ लोग ऐसे भी जो नजरें चुराने में लगे है।  शहर में बिजलियाँ कड़की और मेरा घर था शीशे का,  कहाँ मंसूबा था के लोग अब पत्थर उठाने में लगे है।  भले ही कोशिशें कर ले आंधियां आज़माइश की,  मगर हम भी है जिद में चरागों को जलाने में लगे है।  भटक जाने के डर से वो कहाँ मंजिल को निकले थे,  सुना ही लोग ऐसे अब रास्ता दिखाने में लगे है।।  
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  वक्त की बेरुखी बिछड़ के मुझसे मुझे याद तो करती होगी, शिकायत रब से या फरियाद भी करती होगी।  लिखा था नाम मेरा मेहँदी से हथेली पे उसने एक बार, मगर अब माँग में सिन्दूर किसी और का भरती होगी।  जुदा होने से पहले इस कदर लिपट कर मुझसे रोई थी  बिछड़ के मुझसे रहती है मगर हर रोज तो मरती होगी। जिंदगी तनहा हो और लम्बी भी तो अक्सर बोझ लगती है क्या सावन आने से अब भी वो वैसे ही डरती होगी। खुला रखा है इसी उन्मीद से मैंने घर का दरवाजा,  कभी इक रोज तो वो भी इस रस्ते से गुजरती होगी।।