खिलाफत से 'पोस्टर विवाद' तक: क्या भारतीय मुसलमान अंतरराष्ट्रीय शतरंज के मोहरे हैं?
इतिहास गवाह है कि जवान होता बेटा अपने बाप को निरा बेवक़ूफ़ समझने की गलती जरूर करता है। ठीक ऐसा ही गाय-भैस के बछड़े के साथ होता है जब उसके सींग आने लगते है। उसे लगता है कि अब वो भी साँढ़ या बैल बन जाने के करीब है और फिर उसका रुआब और बढ़ जाएगा। मगर होता इसके ठीक विपरीत है और अंततोगत्वा उसे पता चल ही जाता है कि जैसा वो सोचता था दुनिया उसके बिलकुल विपरीत ही चल रही है। और भले ही वह कितना भी उछाल कूद क्यों न कर ले उसके ऐसे सभी काम मूर्खता की परिभाषा ही तय करेंगे। पिछले कुछ दिनों से राजनितिक और धार्मिक आधार पर किये गए विभिन्न सोशल मीडिया पोस्ट और कमेंट का अगर सही तरीके से विश्लेषण किया जाए तो एक महत्त्वपूर्ण तथ्य जो सामने निकलकर आता है वो सामाजिक सौहार्द्य को बिगाड़ने वाला और धर्म को देश से ऊपर रखने की प्रवित्ति को दर्शाता है। गत दिनों में देश विशेष को लेकर किये गए पोस्टर विवाद और नारेबाजी की घटनाओं के बाद यह पैटर्न बिलकुल साफ़ हो जाता है कि ऐसे लोगों की एक बड़ी खेप तैयार होती जा रही है जो व्यक्तिगत बयानबाजी से देश की छवि को अंतर्राष्ट्रीय ही नहीं भीतर से भी नुकसान पहुंचा रही है। यहाँ एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि ऐसा कौन लोग कर रहे है, उनकी मानसिकता क्या है और उन्हें इससे क्या वास्तव में कोई फायदा मिलेगा या नहीं?
सिलसिलेवार घटनाओं को देखे तो भारत जैसे विशाल देश की सबसे कमजोर कड़ी इसका धार्मिक आधार ही है। धर्म विशेष के लोगों को सदियों से धर्म के आधार पर मूर्ख बनाया गया है। भारत के मुसलमान स्वयं को मुस्लिम पहले और भारतीय बाद में मानते रहे है। इतिहास गवाह है कि प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटिशों के दवारा तुर्की की हार के बाद मुस्लिम धर्मगुरु (खलीफा) को सत्ता से हटाने का किस प्रकार भारतीय मुसलमानो ने अपने धर्म पर सीधा आघात समझा और जिसके परिणाम स्वरुप भारत में अली बंधुओं ने खिलाफत आंदोलन चलाया। महात्मा गाँधी ने सर्वप्रथम इसी धार्मिक विचारधारा को आधार बना कर असहयोग आंदोलन की शुरुआत की थी। 1920 के उस दौर से आज तक भारतीय मुसलमान सिर्फ दूसरे देशों और उनके उनके आकाओ को ही अपना रहनुमा मानते है। यह एक तरह से खुद की पहचान से समझौता करने जैसा है। फ्रीडम एट मिडनाइट पुस्तक के एक प्रसंग में जवाहर लाल नेहरू माउंटबेटन से धार्मिक आधार पर बंटवारे पर असहमति जताते हुए कहते है कि भारत के मुस्लिम अन्य देशों के मुस्लिम जैसे नहीं है कनवर्टेड है, उनके पूर्वज हिन्दू थे और इस लिहाज से धार्मिक आधार पर देश का बंटवारा सही नहीं ठहराया जा सकता है। वास्तव में नेहरू उस समय देश को प्राथमिकता के क्रम में रखते है और धर्म को उसके बाद। सही मायने में देखा जाए तो राष्ट्र ही पहले आता है और धर्म उसके बाद। भारत का संविधान भी धर्म के आधार पर न चलकर सभी को एक समान देखने की वकालत करता है।
परन्तु भारत का मुसलमान इस बात को न सिर्फ समझने में विफल रहा है बल्कि एक नेता विहीन नेतृत्व में आगे बढ़ता रहा है। मुस्लिम लीग के उदय के साथ मुहम्मद अली जिन्ना मुसलमानो की एक प्रमुख आवाज बन कर जरूर उभरे लेकिन उनकी पृथक राष्ट्र की मांग ने न सिर्फ मुसलमानो को दो भागो में बाँट दिया बल्कि नेतृत्व का भी अंत कर दिया। हालंकि बाद के वर्षों में अपने स्वयं के हितों और उद्देश्यों की पूर्ती हेतु अनेको मुस्लिम धर्मगुरुओं ने मुसलमानो की इसी कमी का फायदा उठाया और जातीय एवं धार्मिक हिंसा और द्वेष को बढ़ावा देने का ही कार्य किया। और तो और जिन्ना की मृत्यु के पश्चात पाकिस्तानी मुसलमानो ने भी अरब देशों और अन्य मुस्लिम देशों को ही अपना सर्वेसर्वा माना परन्तु ये देश आज भी उन लोगों को वो इज्जत और रुतबा देने से कतराते रहे है, जिसके वे हकदार रहे है। भारत के धार्मिक आधार पर विभाजन पर यह कहना अधिक सटीक होगा कि "मुसलमान बेवक़ूफ़ थे जो उन्होंने अलग राष्ट्र की मांग की और हिन्दू उनसे ज्यादा बेवक़ूफ़ थे जिन्होंने उनकी बात मान ली।"
अगर वैश्विक नजरिये से देखे तो हिन्दू राष्ट्र होने के बावजूद जब नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली ने जब भारत के विरुद्ध बयानबाजी की और चीन के प्रभाव में आकर भारत के नक़्शे तक का गलत चित्र प्रस्तुत किया तो भारत के हिन्दुओं ने धर्म के आधार पर निर्णय न लेकर भारतीय नीतियों का समर्थन किया। परन्तु इसराइल-फिलिस्तीन युद्ध हो या फिर वर्तमान में ईरान और अमेरिका-इजराइल युद्ध भारत के मुसलमान हमेशा धर्म को ही चुनते आये है। यही नहीं तुर्की और भारत विवाद में भी हमेशा भारतीय मुसलमानो ने भारत के विरोध को ही अपना हथियार बनाया है।
दूसरी तरफ एक मुस्लिम राष्ट्र होने के बावजूद भी पाकिस्तान का मुसलमानो का रहनुमा बनने का सपना अरब और अन्य मुस्लिम देशों को रास नहीं आया। अरब तो ख़ास तौर पर पाकिस्तान से इसी वजह से खफा नजर आता है। इसराइल-अमेरिका के ईरान के खिलाफ युद्ध में भारत समेत अन्य देशों के मुस्लिम भले ही कूद पड़े हो मगर संयुक्त अरब अमीरात, दुबई, जॉर्डन समेत अन्य देशों दवारा अमेरिका को सहायता के तौर पर अपनी जमीन का उपयोग करके युद्ध करने के सवाल और ईरान द्वारा इन देशों पर मिसाइल और ड्रोन से हमले के खिलाफ इनकी कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आती।
एक महत्त्वपूर्ण तथ्य जिसे प्रायः अनदेखा किया जाता रहा है वह परमाणु हथियारों के संभावित खतरे से जुड़ा है। परन्तु क्या वास्तव में ऐसा संभव है कि अमेरिका जैसी अर्थव्यवस्था और उसकी एजेंसियों को चकमा दे कर ईरान परमाणु हथियार बना रहा था और अमेरिकी सोते रहे। यह सवाल इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि जैववैज्ञानिक हथियारों के निर्माण का हवाला देकर इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को बगदाद में अमेरिका ने फांसी जरूर दे दी थी मगर उनके छिपने की जगह पर केवल रसोईघर में कुछ सड़े हुए टमाटर ही मिले थे। ऐसे में सड़े फल-सब्जियों का उपयोग करके जैववैज्ञानिक हथियार बनाने की कला शायद ही अमेरिकियों से बेहतर कोई जानता हो। भारत के परमाणु परीक्षण कार्यक्रम में भी अमेरिका रोड़ा अटकाता रहा है। परन्तु पड़ोसी देश पाकिस्तान के परमाणु शक्ति बनने की उसको भनक तक नहीं लगी। गौरतलब है कि परमाणु हथियार बनाने का साजो सामान चीन से अधिकतर देशों को आयात हुआ है। परन्तु अमेरिका उस पर चुप है। और सिर्फ यही वो वजह है जिसके कारण पाकिस्तान मुस्लिम देशों का रहनुमा बनने का सपना पाल रहा है और यही वो वजह है जिससे भले ही खाड़ी देश उससे दोयम दर्जे का व्यवहार करते हो मगर फिर भी उसे संरक्षण देते आये है। पाकिस्तान और अन्य देशों के मुसलमानो को यह बात भली प्रकार समझने की जरूरत है कि कौन उनका फायदा उठा रहा है और उनका खुद का फायदा किसमें है? जब तक मुसलमान अपने खुद के विकास के बारें में नहीं सोचेंगे और दूसरों को ही रहनुमा मानते रहेंगे तब तक वे तरक्की नहीं कर सकते।
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