गुनाह-ए-बेवकूफी
कभी अपनों कभी रब से किनारा कर लिया मैंने, तसल्ली दिल को झूठी दे के गुजारा कर लिया मैंने। सुना है अब मेरे साये से बचकर लोग चलते हैं, मगर ये ज़हर भी हंसकर गंवारा कर लिया मैंने। इसे खुदगर्जी कह लो,जरूरत या तलब मेरी, तेरी हर बात, हर जज्बात से खुद को पराया कर लिया मैंने। तेरे हर रंग और फितरत से मैं तो खुद ही गाफिल था, खुद ही नजरों से गिर के खुद को बेचारा कर लिया मैंने। सुना है वक्त आता है सभी का जिंदगी में इक बार, इसी एक बेवकूफी को सहारा कर लिया मैंने। अदावत और दौलत के तराज़ू तुम तो न लाते , तेरी उन्मीद रख के ये गुनाह दोबारा कर लिया मैंने।