खिलाफत से 'पोस्टर विवाद' तक: क्या भारतीय मुसलमान अंतरराष्ट्रीय शतरंज के मोहरे हैं?
इतिहास गवाह है कि जवान होता बेटा अपने बाप को निरा बेवक़ूफ़ समझने की गलती जरूर करता है। ठीक ऐसा ही गाय-भैस के बछड़े के साथ होता है जब उसके सींग आने लगते है। उसे लगता है कि अब वो भी साँढ़ या बैल बन जाने के करीब है और फिर उसका रुआब और बढ़ जाएगा। मगर होता इसके ठीक विपरीत है और अंततोगत्वा उसे पता चल ही जाता है कि जैसा वो सोचता था दुनिया उसके बिलकुल विपरीत ही चल रही है। और भले ही वह कितना भी उछाल कूद क्यों न कर ले उसके ऐसे सभी काम मूर्खता की परिभाषा ही तय करेंगे। पिछले कुछ दिनों से राजनितिक और धार्मिक आधार पर किये गए विभिन्न सोशल मीडिया पोस्ट और कमेंट का अगर सही तरीके से विश्लेषण किया जाए तो एक महत्त्वपूर्ण तथ्य जो सामने निकलकर आता है वो सामाजिक सौहार्द्य को बिगाड़ने वाला और धर्म को देश से ऊपर रखने की प्रवित्ति को दर्शाता है। गत दिनों में देश विशेष को लेकर किये गए पोस्टर विवाद और नारेबाजी की घटनाओं के बाद यह पैटर्न बिलकुल साफ़ हो जाता है कि ऐसे लोगों की एक बड़ी खेप तैयार होती जा रही है जो व्यक्तिगत बयानबाजी से देश की छवि को अंतर्राष्ट्रीय ही नहीं भीतर से भी नुकसान पहुंचा रही है। यहाँ एक महत्त्वपूर्ण...