शिक्षा व्यवस्था की कार्यप्रणाली: केवल फीस वृद्धि ही समस्या नहीं है!



 तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है

मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है।

हिंदी साहित्य के महान कवि अदम गोंडवी जी की लिखी नज़्म की ये लाइनें आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितना तब थी। और ये बात वर्तमान शिक्षा पद्धति पर एक दम सटीक बैठती है। संविधान के अनुच्छेद 21A से प्रेरणा लेकर शिक्षा के अधिकार (राइट टू एजुकेशन) का प्रावधान किया गया। जिसे Right of Children to Free and Compulsory Education Act, 2009 के नाम से भी जाना जाता है। इसके तहत १४ वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया गया। चूँकि यह अधिकार गरीब एवं ऐसे लोगों को ध्यान में रख कर बनाया गया जो आर्थिक तंगी की वजह से अपने बच्चों को समुचित शिक्षा नहीं दिला पाते। परन्तु सरकारी स्कूलों के पढ़ाई के तौर-तरीके हमेशा विवादों के घेरे में रहे है। ऐसे में आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत सुदृण मध्यमवर्गीय परिवारों ने निजी संस्थानों को यह सोच कर वरीयता दी कि इससे न केवल उनके बच्चों को बेहतर शिक्षा मिलेगी बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता में भी सुधार होगा। परन्तु यहीं उनसे एक बड़ी चूक हो गयी। शिक्षा के लिए बनाए गए निजी विद्यालय व्यापार का जरिया बन गए जिनके जरिये विद्यालय वाले मनचाही फीस और अन्य खर्चे वसूलने लग गए। हाल ही में तमिलनाडु में निजी विद्यालओं की मनमानी फीस वसूली को लेकर विधान सभा में एक बिल पास किया गया है। जिसको लेकर कयास लगाए जा रहे है कि इसके जरिये निजी विद्यालयों पर नकेल कसने में सहायता मिलेगी। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि निजी विद्यालय आखिर किस प्रकार फीस का निर्धारण करते है? और क्या ये बिल वास्तव में एक सार्थक बदलाव ला पायेगा? दूसरी तरफ सिर्फ फीस बढ़ोत्तरी के अलावा ऐसे कौन से मुद्दे है जो आम नागरिक और अभिभावकों को पता होना चाहिए जो शिक्षा क्षेत्र में व्याप्त भ्रस्टाचार और कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा करते है? विस्तृत जानकारी के लिए यह लेख पूरा पढ़े और अपनी प्रतिक्रिया साझा करें।

शिक्षा का बाजारीकरण:- निजी संस्थानों द्वारा अनुचित रूप से शिक्षण सामग्री, विशेष दुकानदारों से खरीद के लिए अभिवावकों पर न केवल अनुचित दबाव डाला जाता है बल्कि इन दुकानदारों द्वारा दिखावे के तौर पर 10-15% छूट देकर उन्हें ये जताया जाता है कि उन पर अहसान किया जा रहा है। दूसरी तरफ सस्थानो द्वारा तैयार की गयी लिस्ट में किताब कापियों की आवश्यकता से अधिक बढ़ाकर बताया जाता है जबकि या तो उनमें से कुछ बहुत कम या फिर बिलकुल उपयोग में नहीं आती जबकि दुकानदार इन्हें पूरे सेट के तौर पर बेचता है। सिर्फ यही नहीं कंप्यूटर शिक्षा और वैकल्पिक विषय के चुनाव पर अतिरिक्त फीस भी अभिभावकों से वसूली जाती है। प्रतिवर्ष होने वाले विभिन्न आयोजनों में भी छात्रों को कभी परिधान कभी कुछ अन्य सामग्री लाने अथवा संस्थान से उपलब्ध कराने के नाम पर भी पैसे वसूले जाते है जबकि ऐसे परिधानों की गुणवत्ता और उपयोग दोनों सिर्फ अल्पकालिक ही होते है।

शिक्षार्थियों के साथ भेदभाव:- भले ही कई अभिभावकों को लगता है कि बड़े एवं प्रतिष्ठित संस्थानों में उन्होंने अपने बच्चे को दाखिला दिला कर अपने फर्ज से मुक्ति पा ली। जबकि वास्तविक खेल तो इसके बाद शुरू होता है। बड़े संस्थानों में प्रायः किसी भी कक्षा में अंग्रेजी वर्णमाला के 26 अक्षरों की भांति ही प्रत्येक कक्षा के वर्ग विभाजित होते है। जैसे:- 1A,1B,1C,1D इत्यादि। यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि विद्यालय में पढ़ने वाले सभी बच्चों को उनके दाखिले या अन्य किसी आधार पर वर्ग आवंटित नहीं किया जाता बल्कि उनकी शैक्षिक एवं व्यवहारिकता के आधार पर यह आवंटन किया जाता है। जिसके तहत उत्कृष्ट योग्यता रखने वालो को अंतिम वर्ग में उससे कम योग्यता रखने वाले विद्यार्थियों को उसके पहले क्रम में रखा जाता है। अर्थात यदि कोई विद्यार्थी अधिक योग्य है तो उसे अंग्रेजी वर्णमाला के अंतिम वर्ग जैसे J,K,L,M इत्यादि में रखा जायेगा और यदि कम प्रतिभावान है तो उसे A,B C या D वर्ग में रखा जायेगा। अधिक प्रतिभावान बच्चों के साथ शिक्षक अधिक बेहतर तरीके से पढ़ाते है क्योंकि ये ही वो विद्यार्थी होते है जो आगे चलकर विद्यालय का नाम रोशन करते है। क्या आपने कभी गौर किया है कि आपके बच्चे का वर्ग किस प्रकार हर कक्षा उत्तीर्ण करने के साथ बदलता है। यदि नहीं तो आज से ध्यान देना शुरू कर दीजिये।

विद्यालय आखिर किस प्रकार मनमानी फीस वसूलते है?

हम में से अधिकतर लोगों को लगता है कि निजी विद्यालय मनमाने तरीके से फीस वसूलते है और इसका कोई ठोस आधार नहीं होता है। जबकि ऐसा सत्य नहीं है। विद्यालयों के पास फीस बढ़ाने के तर्क का आधार महंगाई दर होती है। अब यहाँ यह समझना जरूरी है कि महंगाई दर तो घटती-बढ़ती रहती है परन्तु फीस हमेशा बढ़ती है ऐसा क्यों? तो इसके पीछे का तर्क भी यह है कि विद्यालय फीस बढ़ाने के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) के आधार पर फीस वृद्धि करते है। वे CPI के एक बेस का चुनाव करके स्कूल फीस में वृद्धि करते है। जबकि CPI हो या WPI (थोक मूल्य सूचकांक) दोनों ही परिवर्तनशील है और थोड़े ही समय में बदलते रहते है। इसके अतिरिक्त महंगाई दर बढ़ने का सीधा प्रभाव व्यक्ति की आय पर पड़ता है। महंगाई आय की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ती है जबकि आय बढ़ने में समय लगता है। इस प्रकार ये कहना बिलकुल ही गलत नहीं होगा कि निजी विद्यालय मनमाने तरीके से फीस वृद्धि करके अनुचित कर रहे है।

अनुचित भुगतान की मांग:- कल्पना कीजिये कि आप किसी चैनल का सब्सक्रिप्शन लेते है, कुछ समय बाद आपको लगने लगता है कि उपयुक्त चैनल आपके मन माफिक प्रोग्राम नहीं दिखा रहा। आप सोचते है चलो कोई बात नहीं अगले महीने से इसे बंद कर देंगे, सब्सक्रिप्शन ख़तम कर देंगे। मगर रुकिए क्या हो अगर आपको पता चले की सर्विस प्रोवाइडर चैनल ने आपसे अगले महीने का आधा पैसा तो पहले ही ले लिया है। अब अगर आपको ठगे जाने का अहसास भी होता है और आप उस चैनल प्रोवाइडर से अपनी अग्रिम जमा राशि वापस मांगते है और वह मना कर देता है तो फिर आपके पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचता। ठीक ऐसा ही निजी विद्यालयों में किया जा रहा है आपका बच्चा अगर 7वीं कक्षा में पढ़ रहा है तो आप कुछ महीनें तो एक माह का शुल्क देते है और कुछ महीनें दो माह की। अगर आप कुल फीस का कैलकुलेशन करें तो आपको पता चलेगा कि आपसे अतिरिक्त फीस अगली कक्षा के लिए भी ली जा रही है भले आप अपने बच्चे को अगले साल उसी विद्यालय में पढ़ाना चाहे या नहीं। यह अतिरिक्त फीस आपको वापस नहीं की जाएगी। और यदि आप इस विषय पर विद्यालय प्रशासन से बहस करते है तो आपके बच्चे को ट्रांसफर सर्टिफिकेट तब तक नहीं दिया जायेगा जब तक आप उस अगले साल की फीस चुका नहीं देते। सिर्फ इतना ही नहीं निजी क्षेत्र के लगभग सभी विद्यालय इस संगठित लूट का हिस्सा है आप चाहे विद्यालय बदले या नहीं आपको इसकी मनमानी बर्दाश्त करनी पड़ेगी।

गुणवत्ता कितनी सही: - कई निजी विद्यालयों में आपने देखा होगा कि बहुत कम उम्र के अध्यापक पढ़ा रहे है, यदि आप इनके बारे में गहराई से पता करेंगे तो काफी शिक्षक तो अध्यापन के प्रचलित मापदंडो को भी पूरा नहीं करते। ऐसे में नए नियुक्त अध्यापक अधिकतर पहचान वाले या उस विद्यालय के पूर्व छात्र-छात्राएं रह चुके होते है। कई विद्यालय तो अन्य अध्यापको को सिर्फ इस आधार पर भर्ती नहीं देते क्योंकि उनकी आयु अर्थात उम्र अधिक है। जबकि उनके विद्यालय में पढ़ने के लिए अधिकतम आयु सीमा (नए शिक्षकों हेतु) 35 वर्ष है।

चुनौतियाँ और भी है जिनके उत्तर हर कोई जानना चाहता है और साथ ही यह भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि सरकार के फीस वृद्धि के खिलाफ लाये गए बिल से क्या वास्तव में आम जनता के जीवन में कोई बदलाव आएगा? और क्या केवल फीस वृद्धि पर चोट करके शिक्षा व्यवस्था में बदलाव लाना संभव हो पायेगा ? इस लेख के सम्बन्ध में अपनी राय अवश्य साझा करें और इस लेख को अन्य लोगों तक अधिक से अधिक पहुंचाए जो बदलाव में विश्वास रखते हो।

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