वक्त की बेरुखी






बिछड़ के मुझसे मुझे याद तो करती होगी,


शिकायत रब से या फरियाद भी करती होगी। 


लिखा था नाम मेरा मेहँदी से हथेली पे उसने एक बार,


मगर अब माँग में सिन्दूर किसी और का भरती होगी। 


जुदा होने से पहले इस कदर लिपट कर मुझसे रोई थी 


बिछड़ के मुझसे रहती है मगर हर रोज तो मरती होगी।


जिंदगी तनहा हो और लम्बी भी तो अक्सर बोझ लगती है


क्या सावन आने से अब भी वो वैसे ही डरती होगी।


खुला रखा है इसी उन्मीद से मैंने घर का दरवाजा, 


कभी इक रोज तो वो भी इस रस्ते से गुजरती होगी।।

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