शीशे के घर और हब्तूर के पत्थर: अमेरिका को नसीहत देने चले अरबपति की पोल-खोल।



कहावत है कि काबुल में गधे नहीं पाए जाते। अगर इसके शाब्दिक अर्थ (लिटरल मीनिंग) को दरकिनार कर के देखा जाए तो यह कहना गलत नहीं होगा कि काबुल में भले ही गधे नहीं पाए जाते हो मगर कुछ देश ऐसे भी है जहाँ ऐसे लोगों की एक बड़ी खेप मौजूद है। हालिया ईरान बनाम इसराइल और अमेरिका की घटनाओं को देख कर इस बात पर यकीन करना बहुत ही आसान हो जाता है। अब UAE के प्रमुख उद्योगपतियों में से एक अरबपति खलफ़ अहमद अल हब्तूर के बयान को ही ले लीजिये। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को लिखे एक एक खुले पत्र में इस उद्योगपति ने जो सवाल उठाये है उसे पढ़ कर यह कहना बिलकुल भी गलत नहीं होगा कि हब्तूर मियां यह सब एक सस्ती पब्लिसिटी के लिए कर रहे है। हालाँकि उनके ट्रम्प पर दागे गए सवालों को सुनकर मैं खुद को रोक नहीं पाया और उनके जवाब मैंने खुद से देने की ठानी। हाँ ये बात और है कि न तो मेरा ट्रम्प से कुछ लेना देना है और न ही हब्तूर साहब से।

हब्तूर साहब ने पहला प्रश्न ये पूछा है कि "आपको हमारे इलाके को ईरान के साथ जंग में घसीटने का अधिकार किसने दिया? और आपने यह खतरनाक फ़ैसला किस आधार पर लिया?"

तो भाई साहब पहले तो आपको अपनी सरकार से ये सवाल पूछना चाहिए कि भाई किस आधार पर आपने अमेरिका को अपने देश की जमीन इस्तेमाल करने का अधिकार दिया गया। जबकि इतिहास गवाह है जहाँ एक बार अमेरिका ने अपना सैन्य बेस या छावनी बनायीं है बहुत मुश्किलों के बाद ही वहां से हटाया है। भले ही युद्ध ख़तम हो जाए मगर यह उनकी कूटनीति का एक आजमाया हुआ तरीका है जिसे वह बरसो से इस्तेमाल करते आये है। ऐसे में इतिहास को दरकिनार करके क्या आपने धार्मिक कट्टरवाद की नियत से अमेरिका का सहयोग नहीं किया। रही बात ऐसा फैसला लेने की तो आपके देश के रहनुमाओं को लगा की सांप भी मर जायेगा और लाठी भी नहीं टूटेगी। मगर जब ईरान ने आपके देश में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानो को निशाना बनाया तो आप उलटे अमेरिका को ताव दिखाने लगे है।

आपका दूसरा प्रश्न "क्या आपने ट्रिगर खींचने से पहले होने वाले नुकसान का हिसाब लगाया था? और क्या आपने सोचा था कि इस बढ़ोतरी से सबसे पहले इस इलाके के देशों को ही नुकसान होगा?

हब्तूर साहब शायद आपने कोलैटरल डैमेज का नाम पहली बार सुना होगा। युद्ध में नुक्सान सिर्फ युद्ध लड़ने वाले देशों को ही नहीं होता बल्कि उनके आस-पास और सहयोगियों को भी होता है। ऐसे में इस युद्ध से होने वाले नुकसान का आंकलन कितने दिन युद्ध चलता है और कितनी अधिक क्षति होती है इसके आधार पर लगाया जाता है। ऐसे में आपने थोड़ी जल्दबाजी दिखा दी अभी तो युद्ध महज शुरू ही हुआ है। रही बात वास्तविक नुकसान की तो अमेरिका और बाकी के खाड़ी देशों के लिए अपनी आर्थिक धाक बनाये रखने की जो सनक सदियों से चली आ रही है उसके कारण आपके देश के हुक्मरानों को तेल से मिलने वाले फायदे और आर्थिक फायदा कहीं ज्यादा नजर आया। दूसरी तरफ उन्हें तो ऐसी आशंका भी नहीं थी कि ईरान अमेरिका या फिर खुद उनके देश पर आक्रमण करेगा। अब भले कि कल को ईरान का खुद का वजूद रहे या न रहे मगर कहावत है न कि हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे। वैसे भी मुझे नहीं लगता कि जितना फायदा आपको ईरान की बर्बादी से होने वाला है उसके मुकाबले यह कीमत तो बहुत कम ही होगी।

आपका अगला सवाल कि क्या यह अमेरिका का फ़ैसला था या नेतन्याहू का दबाव था?

तो भाई साहब, सबसे पहले तो यह बताइये कि कौन सा नशा करके बैठे है आप? या तो आप इतने मासूम है जिन्हें भूराजनैतिक घटनाओं का कुछ भी इल्म नहीं है या फिर आप सिर्फ अपनी भड़ास (फ़्रस्ट्रेशन) निकालना चाहते है? भाई अमेरिका की नीति अमेरिका फर्स्ट की रही है जिसका सीधा सा अर्थ किसी भी परिस्थिति में अमेरिकी हितो को प्राथमिकता देना है फिर चाहे वो व्यापार से जुड़ी हो, राजनीती से या फिर सुरक्षा से। अमेरिका ईरान तो क्या किसी भी अन्य देश को आगे बढ़ते नहीं देख सकता और उसे रोकने के लिए हर संभव कदम उठाने से पीछे नहीं रहता। टैरिफ वॉर, ट्रेड वॉर, भूराजनीतिक विषयों में हस्तक्षेप ऐसे बहुत से हथकंडे है जिन्हें वह पहले से आजमाता आया है। फिर ऐसे में यह कहना कि उसे नेतन्याहू ने उकसाया बचपने वाली बात है। बाकी आप खुद समझदार होंगे ऐसा मुझे लगता है।

फिर आप पूंछते है कि क्या अमेरिका ने निकालने से पहले कोलेटरल डैमेज का हिसाब लगाया था?

भाई साहब इसका जवाब मैं पहले ही दे चुका हूँ। अमेरिका को पहले ही पता था कि उसका नुकसान होगा, मगर आप लोगों ने जो पड़ी लकड़ी ले ली है उससे आपके देश के संसाधनों,अर्थव्यस्था और आधारभूत संरचना (इंफ्रास्ट्रक्चर) का जो नुकसान होना है उसका अंदाजा आपको खुद लगाना होगा। हाँ ये बात और है कि युद्ध समाप्ति के बाद अमेरिका आपकी अर्थव्यस्था को सुधारने के लिए विश्व बैंक से सहायता देने के तौर पर औपनिवेश स्थापित करने की नीति अपनाये तो अलग बात है।

आपके कहने के अनुसार अमेरिका ने GCC देशों को उस खतरे के बीच में रखा, जिसे उन्होंने नहीं चुना था?

यह कहना सरासर गलत है। भाई विश्व के अन्य देशों में व्याप्त आतंकवाद अधिकतर इन्हीं GCC देशों द्वारा प्रायोजित है। आतंकियों की पनाहगाह बन चुके ये देश खुद तो पाक साफ़ बने रहने का ढोंग रचते है मगर अन्य देशों में आतंकी घटनाओं और समूहों को न सिर्फ ऐसा करने को उकसाते है बल्कि अस्थिरता भी पैदा करते है। आखिर क्या कारण है कि अधिकतर आतंकी अक्सर वारदात के बाद दुबई, UAE और ऐसे अन्य देशों में जा कर आराम से रहते है और कोई भी देश उनके खिलाफ कुछ करने की हिम्मत नहीं कर पाता। क्या यह सच नहीं है कि तेल की कमाई का एक बड़ा हिस्सा ऐसे अपराधों को प्रायोजित करने में खर्च किया जाता है। हाँ मगर इस बार आपका दांव उल्टा पड़ गया। अब न निगलते बन रहा है और न उगलते आप तेल बेचकर बाजार में अपना एकाधिकार जमाना चाहते थे और इसका सबसे बड़ा कांटा ईरान था तो साहब कोयले की दलाली में हाथ काले होते है है। मगर इस बार तो आग से खेलने के चक्कर में आप खुद अपना हाथ जला बैठे तो इसमें दूसरों का कुसूर क्या है?

फिर आपका ये सवाल कि अमेरिका के "बोर्ड ऑफ़ पीस" इनिशिएटिव को गल्फ़ देशों ने फ़ंड किया था. अब हम पर हमला हो रहा है. वह पैसा कहां गया?

भाई सीधी सी बात है युद्ध के जरिये ही शांति आती है। अब आपका देश कोई बुद्ध का देश तो है नहीं कि शांति के लिए युद्ध का सहारा नहीं लिया जायेगा। खाड़ी देशों ने अपने बचाव के लिए इसे अपनाया था और पैसा भी दिया मगर वे ये बात भूल गए कि इसका निर्णय कौन लेगा और इस कदम को अमली जामा पहना पाना असंभव है। एक तरफ तो खाड़ी देश इसके जरिये अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहते है दूसरी तरफ वे ही आतंकियों को पैसा भी दे रहे है। मगर जैसा कि अमेरिका के मशहूर लेखक बर्नार्ड शॉ ने कहा है था कि हम इतिहास से कुछ नहीं सीखते। ठीक आपके साथ भी वैसा ही कुछ होता दिख रहा है। वर्ना UAE ने इसी वर्ष फरवरी माह में ही पाकिस्तान के साथ भी "एकीकृत सुरक्षा" सिद्धांत पर जिसके तहत पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शेख तहनून बिन जायद अल नाहयान से मुलाकात के बाद पाकिस्तान से औपचारिक रूप से कहा था कि संयुक्त अरब अमीरात की सुरक्षा "पाकिस्तान की अपनी सुरक्षा का अभिन्न अंग" है। उसका क्या हुआ? अब पाकिस्तान कहाँ है और उसने आपकी मदद क्यों नहीं की? जबकि अन्य सुन्नी राष्ट्रों में एकलौता पाकिस्तान ही ऐसा है जिसके पास परमाणु हथियार है। और यही वो वजह है जिससे वह आपका ख़ास बना हुआ है। बात सिर्फ यही ख़तम नहीं होती यूएई का ईडीजीई ग्रुप ड्रोन प्रौद्योगिकी और गोला-बारूद के लिए पाकिस्तान को एक साझेदार के रूप में देख रहा था फिर अब अचानक क्या हुआ? कहाँ है आपका वो साझेदार यह सवाल तो पूछना बनता है?

आप अमेरिका से पूछ रहे है कि अमेरिका ने कोई जंग न करने का वादा किया था.फिर भी उसने 7 देशों सोमालिया, इराक, यमन, नाइजीरिया, सीरिया, ईरान और वेनेज़ुएला पर अटैक किया?

तो भाई ऐसा है कि वादा करना और निभाना दोनों अलग-अलग बात है। जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि सवाल तो आपको अपने करीबियों से भी पूछने चाहिए मगर क्या आप ऐसा करेंगे? तो जवाब सीधा सा है नहीं। और रही बात अमेरिका की तो वह विश्व में अपना आधिपत्य बनाये रखना चाहता है फिर चाहे तेल की कीमतों को लेकर हो, दूसरे देशों की सरकारों से हो, रेयर अर्थ मटेरियल से हो, मिलेटरी पावर से हो या फिर किसी और तरीके से। सब पैसे और ताकत का खेल है बाबू भैया। फिर भी अगर आपको लगता है कि अमेरिका ने आप से दगाबाजी की तो रिश्ता तोड़ देते न ऐसी भी क्या मजबूरी है? अब सर दिया ओखली में तो मूसलों से क्या डरना।

आप ट्रम्प को बोल रहे हो कि उसकी अप्रूवल रेटिंग 400 दिनों में 9% कम हो गई है?

भाई बस कर हंसा-हंसा कर रुलाएगा क्या? उसे इससे क्या फर्क पड़ता है। वैसे भी डेमोक्रेटिक कंट्री और आपके यहाँ बहुत अंतर है जनमत संग्रह करवा लो जिस शरिया की दुहाई दे रहे हो उसी के खिलाफ लोग खड़े हो जायेंगे। रही बात अप्रूवल रेटिंग की तो नेतन्याहू का भी अपने देश में विरोध होता रहा है और चीन में जिनपिंग का तो उसका क्या? तुम्हें कब से उसकी अप्रूवल रेटिंग की चिंता होने लगी। अपनी सोचों अपनी। क्या ये सच नहीं है कि इतने सालों बाद तुम्हें महिलाओं के अधिकार की याद आयी और फिर भी उन्हें मिला क्या आधा अधूरा न्याय।

आखरी सवाल जो आपने पूछा है कि ट्रम्प ने अमेरिकियों से शांति का वादा किया गया था. उन्हें उनके टैक्स से युद्ध के लिए फ़ंड मिल रहा है?

तो भाई साहब युद्ध सरकारें पब्लिक के पैसे से ही लड़ती है। अमेरिका के लिए उसकी सुरक्षा एक विकल्प नहीं प्राथमिकता है जिसके लिए वह हर कीमत चुकाने को तैयार है। सवाल अब ये है कि क्या आप और आपका देश उसके लिए तैयार है? आपके यहाँ टैक्स कम हो सकता है या टैक्स फ्री हो सकता है क्योंकि आपके पास संसाधन है मगर अमेरिका के पास सोच और विज्ञान की ताकत है जो आपके यहाँ नहीं है। यही फर्क है अमेरिका में और अन्य देशों में। आपको लगता है कि आपके इन बेतुके सवालों के जवाब देकर ट्रम्प आपको महत्तव देंगे तो एक बार फिर आप गलती कर रहे है। आपके पूछे गए कई सवाल अमेरिकी जनता द्वारा पूछे गए होते तो समझ में भी आता। ये पब्लिसिटी स्टंट छोड़िये और काम पर ध्यान दीजिये। न तो आप किसी देश के वजीरे आजम है और न ही कोई बड़े तुर्रमखां जो अमेरिका आपको भाव देगा। अंत में सिर्फ इतना ही कहूंगा कि जिनके खुद के घर शीशे के हो वो दूसरों के घर पर पत्थर नहीं फेंका करते। पड़ी लकड़ी ली है आपने तो जवाब तो देते बनता था बस यही सोच कर खुद को रोक नहीं पाया।

बाकी भूलचूक को छोटा भाई समझ कर माफ़ कर दीजियेगा।

Courtesy:- https://www.aajtak.in/world/story/uae-billionaire-khalaf-ahmad-al-habtoor-open-letter-donald-trump-iran-us-war-mdsb-ntc-dskc-2487329-2026-03-06?utm_source=Internal_AT&utm_medium=Article&utm_name=Read_More_1

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