आखिर क्यों जरूरी है राम मंदिर


अगर विगत कई सालों के राजनितिक फायदों को दर किनार कर दिया जाये तो भी एक यछ प्रश्न प्रायः ही हमारे सामने खड़ा होता है की अयोध्या में राम मंदिर आखिर क्यों जरूरी है? और क्या वास्तव में इससे किसी को (खासकर हिन्दुओं को) वास्तव में कोई दिलचस्पी होनी चाहिए या नहीं? तो सबसे पहले मैं इस विषय को काल खण्डों से निर्दिष्ट कुछ तथ्यों और तर्कों से जोड़कर आपको इसके महत्त्व के बारे में बताना चाहुगा.
मंदिर बनाम मस्जिद :-इतिहास के पन्नो को अगर पलटकर देखे तो हम पाते है की मुग़ल वंश का संस्थापक और लुटेरा बाबर कोई और नहीं बल्कि हिन्दुओं का कट्टर शत्रु और उनके धार्मिक रीति रिवाजों को को ठेस पहुंचाने वाला एक विदेशी आक्रान्ता था. जिंसने बड़ी ही क्रूरता और अमानुषिक ढंग से हिन्दुओं का नरसंहार कराया और अनेक हिन्दू तथा जैन मंदिरों को नस्ट कर दिया. बाबर के तात्कालिक गवर्नर मीर बाकी ने पुजारियों से यह स्थान छीनने के बाद हिन्दुओं के पूज्य स्थान राम मंदिर को 1527 ईस्वी में गिराकर मस्जिद का निर्माण कराया. इस बात की पुष्टि करता हुआ एक शिला लेख 1992 में बाबरी मस्जिद के ढहाए गए अवशेषों से भी प्राप्त हुआ है. यही नहीं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने वर्ष 1970 1992 और 2003 में विवादित स्थल की खुदाई की और इस बात को और पुख्ता किया की खुदाई से प्राप्त अवशेष वहां पर हिन्दू मंदिर होने की पुष्टि करते है. हालाँकि वही मुस्लिम धर्मावलंबियों का ये मानना है की वर्ष 1528 में जब मस्जिद बनायीं गयी तो वहां मंदिर का कोई अस्तित्व नहीं था बल्कि वर्ष 1949 में अवैध रूप से मूर्तियां रखी गयी. गौर करने वाली बात ये भी है की विध्वंश के बाद मलबे से निकाले गए अवशेसों में एक शिलालेख भी है जिसमे नागरी लिपि में (ग्यारवी तथा बारहवीं शताब्दी में प्रचिलत) 20 पंक्तियां और 30 श्लोक है.इस प्रकार अगर हम ऐतिहासिक तथ्यों पर गौर करें तो यह बात स्पस्ट रूप से तार्किक सिद्ध होती है की अयोध्या में राम मंदिर की पुनः स्थापना न केवल हिन्दुओं को उनका खोया हुआ अधिकार दिलाएगी बल्कि तर्क संगत भी प्रतीत होती है.

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