अक्स-ए-सफर (सफर की परछाई) दिया सूरज को दिखलाने में लगे है, चंद कुछ लोग मुझको आजमाने में लगे है। कभी करते थे जो बातें हमेशा साथ देने की, वही कुछ लोग अब आँखें दिखाने में लगे है। भुला बैठे है शायद की किसकी कोशिशों से पायी है मंजिल, मेरे कुछ दोस्त मुझको समझाने में लगे है। मेरी मंजिल अभी है दूर और फासला लम्बा, कहाँ समझेंगे वो लोग जो बातें बनाने में लगे है। कभी उन्मीद रखी जो तो बेमानी हुई साबित, है कुछ लोग ऐसे भी जो नजरें चुराने में लगे है। शहर में बिजलियाँ कड़की और मेरा घर था शीशे का, कहाँ मंसूबा था के लोग अब पत्थर उठाने में लगे है। भले ही कोशिशें कर ले आंधियां आज़माइश की, मगर हम भी है जिद में चरागों को जलाने में लगे है। भटक जाने के डर से वो कहाँ मंजिल को निकले थे, सुना ही लोग ऐसे अब रास्ता दिखाने में लगे है।।